ਨਾਨਕ ਤਰੀਐ ਸਚਿ ਨਾਮਿ ਸਿਰਿ ਸਾਹਾ ਪਾਤਿਸਾਹੁ ॥
Naanak Thareeai Sach Naam Sir Saahaa Paathisaahu ||
O Nanak, they swim across with the True Name of the Lord, the King above the heads of kings.
ਮੈ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਨ ਵੀਸਰੈ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਰਤਨੁ ਵੇਸਾਹੁ ॥
Mai Har Naam N Veesarai Har Naam Rathan Vaesaahu ||
May I never forget the Name of the Lord! I have purchased the Jewel of the Lord’s Name.
ਮਨਮੁਖ ਭਉਜਲਿ ਪਚਿ ਮੁਏ ਗੁਰਮੁਖਿ ਤਰੇ ਅਥਾਹੁ ॥੮॥੧੬॥
Manamukh Bhoujal Pach Mueae Guramukh Tharae Athhaahu ||8||16||
The self-willed manmukhs putrefy and die in the terrifying world-ocean, while the Gurmukhs cross over the bottomless ocean. ||8||16||
ਸਿਰੀਰਾਗੁ (ਮਃ ੧) ਅਸਟ (੧੬) ੮:੩ – ਗੁਰੂ ਗ੍ਰੰਥ ਸਾਹਿਬ : ਅੰਗ ੬੪ ਪੰ. ੩
Sri Raag Guru Nanak Dev
गुरू गोबिन्द सिंह जी रोजाना शाम को सिंघों को साथ लेकर शिकार खेलने जाते और शेरों तथा चीतों का शिकार करते। शिकार पर जाने से सिंघों हौसले बहुत बढ़ गए और उन्होंने शेरों आगे डटना शुरू कर दिया। एक दिन गुरू जी शिकार किये गये शेर की चमड़ी उतरवा कर अपने साथ ले आए। उन्होंने हुक्म किया कि इस चमड़ी को एक गधे पर मढ़ दिया जाये और रात के अंधेरे में गाँवों के नजदीक छोड़ दिया जाये। सिंघों ने ऐसा ही किया।
सुबह गाँव के लोगों ने जब उस गधे को देखा तो उस पर शेर की चमड़ी होने के कारण, उनको यह लगा जैसे गाँव के नजदीक शेर घूम रहा हो। सारे गाँव में ख़बर फैल गई। गाँव के लोग शेर के डर से सहम गए। कोई भी उस तरफ जाने की हिम्मत न करता। दो तीन दिन वह गधा बिना रोक टोक फसल और घास चरता हुआ गाँव के आस-पास घूमता रहा। किसी ने ध्यान ही नहीं दिया कि जो घास चरता हो वह शेर नहीं हो सकता। दूर से ही उसकी चमड़ी देख कर अनुमान लगा लेते कि वह शेर था।
एक दिन एक कुम्हार उस तरफ से अपने गधे ले कर जा रहा था। उसके गधों ने रेंकना शुरू कर दिया। शेर की चमड़ी वाले गधे से भी अपने भाइयों की आवाज का जवाब दिए बिना नहीं रहा गया, उसने भी उनकी सुर के साथ अपनी सुर मिला दी। जब कुम्हार ने उसे रेंकते हुए सुना तो उसके ऊपर से शेर की चमड़ी उतार दी। अपना ग़ुम हुआ गधा मिलने पर वह बहुत खुश हुआ और गधे के दो डंडे मार दूसरे गधों के साथ मिला लिया। गधे के रेंकने से उसकी पोल खुल गई।
गांव के लोगों को जब पता लगा कि यह शेर की चमड़ी गधे पर गुरू गोबिन्द सिंह ने सिलवाई थी तो वे सभी इकठ्ठा होकर गुरू जी के पास पहुंच गए। उन्होंने विनती की, ‘गुरू जी, आपने तीन दिन तक गाँव के लोगों को एक गधे से क्यों डराया, इसमें कौनसा भेद था ? वह हम सभी को समझाया जाये।’
गुरू जी ने फरमाया, ‘यह चरित्र सिघों (सिक्खों) को समझाने के लिए रचा गया था। एक सिक्ख बाहर के दिखावे के चिह्नों के साथ सिंह नहीं बन जाता। सिंह के अंदर भी सिक्खी होनी चाहिए। शेर की चमड़ी डाल कर गधा शेर नहीं बन सका। तीन दिन वह गधा गाँव के भोले भाले लोगों को जरूर डराए रखा। जब उसका भेद खुल गया तो वह फिर से एक गधा बन कर रह गया।
सिक्ख इस तरह केस, दाढ़ी रख कर, कृपाण डाल कर सिंह नहीं बन जाता। कर्मों से खाली नकली सिंह भले ही बुलवा सकता है। सिक्ख के अंदर भी सिक्खी का होना जरूरी है। सिक्ख वास्तव में कर्मों से ही परखा जा सकता है। इस तरह की रहनी (नित्यकर्म/अवस्था) गुरू की शिक्षा पर चल कर ही प्राप्त होती है।
शिक्षा -हमें दिखावे के सिक्ख नहीं बनना चाहिए, सिक्खी के आदर्श और गुरू के हुक्म पर चल कर ही असली सिक्ख बना जा सकता है।
Waheguru Ji Ka Khalsa Waheguru Ji Ki Fateh – Bhull Chuk Baksh Deni Ji –
बादशाह बाबर की मौत के बाद उसका बड़ा पुत्र हुमायूँ बादशाह बना। परन्तु शेर ख़ान ने कनौज में हुमायूँ को बहुत भारी हार देकर हिंदुस्तान का राज हासिल कर लिया। हुमायूँ अपनी जान बचाने के लिए आगरा से लाहौर की तरफ भाग निकला। हुमायूँ को पंजाब पहुंच कर याद आया कि उसके पिता बाबर को, गुरू नानक देव जी ने कहा था कि उसकी सात पुश्तें हिंदुस्तान पर राज करेंगी। गुरू नानक जी के बोले हुए वचन झूठे क्यों हो रहे थे, जबकि उसकी अभी दूसरी ही पुश्त है।
इसका निर्णय करने के लिए उसने अपने मंत्री को पूछा, ‘वर्तमान में गुरू नानक जी की गद्दी पर कौन है?’ उसने उत्तर दिया, ‘गुरू अंगद देव जी हैं। उनका डेरा दरिया ब्यास के आगे खडूर गाँव के नज़दीक है।’ हुमायूँ, मंत्री को साथ लेकर गुरू अंगद देव जी के डेरे पहुंच गया। उस समय गुरू जी बच्चों को पढ़ा रहे थे। हुमायूँ जाकर खड़ा हो गया। गुरू जी अपने ध्यान में लगे हुए, बच्चों को पढ़ाते रहे। उन्होंन हुमायूँ के आने की ओर कोई विशेष रूप से ध्यान नहीं दिया।
हुमायूँ को यह देख कर बहुत गुस्सा आया। उसने यह सोच कर कि गुरू जी ने उसके आने की कोई परवाह नहीं की, उसने गुरू जी को कत्ल करने का मन बना लिया और जब वह जब म्यान में से तलवार निकालने लगा तो गुरू जी ने कहा, ‘हुमायूँ, यह तेरी तलवार तब कहाँ थी जब तू शेर ख़ान से हार कर भागा था। अब तूँ फकीरों पर तलवार चला कर अपनी बहादुरी दिखा रहा है। जब तूँ उससे डर कर भाग रहा था तब शेर ख़ान को तलवार क्यों नहीं दिखाई?’
गुर जी से खरी-खरी सुन कर हुमायूँ बहुत शर्मिंदा हुआ। उसने हाथ जोड़ कर गुरु जी से विनती की, ‘मुझ से भूल हो गई। आप ख़ुदा का रूप हो मुझे माफ कर दीजिए। मैं आपसे यह पूछने आया हूँ कि गुरू नानक देव जी ने मेरे पिता को सात पुश्तों का राज दिया था, परन्तु यह वचन झूठा क्यों होने लगा है?’
गुरू जी ने कहा, ‘जब तक बादशाह इंसाफ करता है तब तक उसका राज भाग्य बना रहता है। तुमसे कोई बेइन्साफ़ी हुई होगी, जिस कारण तुम्हारा राज चला गया। अगर तूँ अभी मुझ पर तलवार न उठाता तो तुझे राज अभी ही मिल जाना था, परन्तु अब तूँ वापस ईरान चला जा, जब फिर तुम वापस आओगे तो तुम्हे राज मिल जायेगा। पंद्रह सालों के बाद 22 जून, 1555 ईस्वी को हुमायूँ फिर हिंदुस्तान का बादशाह बना। गुरू नानक देव जी और गुरू अंगद देव जी के वचन सच्चे हुए।
शिक्षा -अपनी ताकत का कभी अहंकार नहीं करना चाहिए और इस ताकत का उपयोग कर किसी के साथ बेइन्साफी या जोर-जबरदस्ती नहीं करनी चाहिए ऐसा करने से परमात्मा जल्दी ही ताकत से खाली कर देता है।
Waheguru Ji Ka Khalsa Waheguru Ji Ki Fateh – Bhull Chuk Baksh Deni Ji –