Saakhi – Shivnath Yogi Ka Jhooth

Saakhi - Shivnath Yogi Ka Jhooth

ਇਹਨੁ ਪੰਜਾਬੀ ਵਿੱਚ ਪੜ੍ਹੋ ਜੀ 

गुरु अंगद देव जी और शिव नाथ योगी का झूठ

गुरू अंगद साहब जी के खडूर साहब प्रवास के दौरान इसी गाँव में एक शिव नाथ का नाम योगी रहता था। योगी वो संत होते थे जो विवाह नहीं किया करते थेे। उसकी क्षेत्र के लोगों पर बहुत पकड़ थी। शिव नाथ को अपने पर बहुत अभिमान था। उससे गुरू जी की प्रसिद्धि देखी न गई और वह गुरू साहब से ईष्र्या रखने लगा। उसने गुरू साहब से छुटकारा पहनने के लिए योजनाएँ बनाना आरंभ कर दिया। वह गुरू जी से किसी न किसी तरह छुटकारा चाहता था। एक बार, लम्बे समय तक बारिश नहीं हुई। फसलों को सूखे का खतरा पैदा हो गया, जिससे लोग चिंतित हो गये।

वह योगी के पास गए और उसको इस बारे कुछ करने के लिए कहा। योगी ने गुस्से में जवाब दिया, ‘मूर्खो! जब आप एक विवाहित व्यक्ति (गुरू अंगद साहब जी) को अपने गुरू के तौर पर देखते हो? तो आप बरसात की आशा कैसे कर सकते हो ? उसको गाँव में से बाहर भेज दो आपको बारिश जरूर मिलेेगी।

योगी की बातों में कुछ लोग गुरू जी के पास गए और कहा, ‘गुरू जी, बारिश की कमी के चलते फसलें मर रही हैं। यदि आप कृपा करके इस गाँव को छोड़ दें तो योगी हमारे लिए बारिश ला कर हमें बचा लेगा।’ ‘प्यारे मित्रो’, गुरू जी ने जवाब दिया, ‘बारिश और धूप कुदरती हैं। वह परमात्मा के हाथ में हैं। फिर भी, मुझे गाँव छोडने की कोई चिंता नहीं यदि इससे आपका भला होता है।’ अगले दिन, गुरू जी ने गाँव छोड़ दिया।

लोग एक बार फिर बारिश का कहने के लिए योगी के पास गए। योगी ईश्वरीय कानून के खिलाफ कुछ नहीं कर सकता था बारिश नहीं हो पाई। लोगों ने फिर कुछ दिन ओर इंतजार किया और जब फिर भी बारिश नहीं हुई सभी बहुत गुस्सा हो गए और उनको अपनी गलती का अहसास हो गया। सबने गुस्से में आ कर योगी को उसकी झोंपड़ी से घसीट कर अपने खेतों में ले गए। ईश्वर की कुदरत से कुछ ऐसा हुआ कि जिस-जिस खेत में योगी को घसीटा जाये वहाँ-वहाँ बारिश हो जाये। यह कौतुक देख हर कोई योगी को अपने खेत में घसीटने को उतावला था। जिससे योगी की हालत खराब हो गई। योगी को अब यह पता लग चुका था कि यह सब गुरू जी को गाँव से बाहर करवाने का फल है। उसने सारी बात गाँव वालों को बताकर माफी माँगी और फिर कभी झूठ न बोलने का प्रण लिया।

इसके बाद सभी गाँव वालों ने गुरू जी के पास जाकर अपनी गलती की माफी माँगी। गाँव वासी विनती कर गुरू जी को बहुत सत्कार के साथ वापस गाँव ले आए। गुरू साहब ने लोगों को परमात्मा की इच्छा पर विश्वास करने के लिए कहा। इसके बाद गुरू साहब ने इस गाँव में एक सांझी रसोई की शुरुआत की। जिसको ‘गुरू का लंगर’ के नाम के साथ जाना जाने लगा। यहाँ कोई भी किसी भी समय आ सकता था और मुफ्त में लंगर ले सकता था। इस लंगर में सभी जातियों, धर्म, रंग और नस्लों के पुरुष, औरतें और बच्चे एक साथ बैठ परशादा ग्रहण करते और सेवा करते थे।

शिक्षा – हमें किसी से ईष्र्या नहीं रखनी चाहिए और वाहिगुरू जी की मर्जी को बिना किसी ना नुकर के मान लेना चाहिए।

Waheguru Ji Ka Khalsa Waheguru Ji Ki Fateh
– Bhull Chuk Baksh Deni Ji –

LEAVE A REPLY

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.