Saakhi – Raagi Singh Ki Shikayat

Saakhi - Raagi Singh Ki Shikayat

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रागी सिंह की शिकायत

एक बार की बात है कि मीरी-पीरी के मालिक साहिब श्री हरगोबिन्द सिंह जी का दीवान सजा हुआ था परन्तु सतगुरू अभी दरबार में नहीं आए थे। दीवान में रागी कीर्तन करते हुए एक शब्द की व्याख्या कर रहे थे। उसी समय भाई सुथरा जी जो गुरू साहब के प्यार वाले सिक्ख थे दरबार में आए। उन्होंने देखा कि गुरू साहब जी अपने सिंहासन पर विराजमान नहीं हैं और रागी कीर्तन और शब्द की व्याख्या कर रहे हैं। परन्तु संगत में बैठे कुछ व्यक्ति और महिलाएं बातें कर रहे हैं।

सुथरा यह कुछ देख कर चकित रह गया वह दोनों हाथ जोड़ कर रागियों की तरफ पीठ कर उनके आगे जा खड़ा हुए। रागियों ने उसको झिड़कते कहा, ‘सुथरे ! आगे से हट जा, देखता नहीं कि कीर्तन हो रहा है और तू आगे आ खड़ा है।’

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‘साध संगत जी ! सत करतार। सुथरे ने जोर से ऊँची आवाज में कहा। सभी का ध्यान सुथरे की तरफ हो गया कि पता नहीं, यह क्या कहने लगा है। सुथरा बोला, ‘सतगुरू की प्यारी साध संगत जी ! लाख लानत है सुनाने वालों को और लाख लानत है ऐसे सुनने वालों को।’ यह शब्द कह कर सुथरा खिसक गया। रागियों ने इसमें अपनी बेइज्जती महसूस की। संगत में भी इन शब्दों की चर्चा शुरु हो गई।

थोड़ी देर बाद मीरी-पीरी के मालिक सतगुरू जी गुरदरबार में पधारे। सतगुरू ने पूछा क्या बात है? आज कीर्तन क्यों नहीं हो रहा? यह शोर किस बात को लेकर हो रहा है?

एक रागी उठा और विनती करन लगा, ‘सच्चे पातशाह ! आज आपका लाडला सुथरा संगत में गालियों निकाल कर गया है और स्वयं खिसक गया है। हजूर ने पूछा, ‘क्यों भाई गुरमुखो ! वह क्या गालियां निकाल कर गया है और कौन सी बात और किस को गालियों निकालीं ?

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‘सच्चे पातशाह जीओ ! आप घट-घट के जानने वाले हो। रागी ने दोनों हाथ जोड़ कर विनती की और कहा सच्चे पातशाह जीओ। उसने किसी को गाली नहीं निकाली। बल्कि संगत में यह कह कर गया हैं, लाख लानत है सुनाने वालों को और लाख लानत है ऐसे सुनने वालों को। सतगुरू जी हैरान थे कि ऐसा क्यों हुआ? क्या किसी ने उससे कुछ कहा था? आपने हुक्म किया कि जाओ ! जहाँ भी सुथरा मिले पकड़ लाओ।

सुथरा शहर से बाहर खिसक गया। एक-दो दिन उसकी खोज होती रही, परन्तु वह कहीं नहीं मिला। धीरे-धीरे यह बात सभी को भूल गई। तीन सवा तीन महीनों बाद सुथरा फिर गुर-दरबार में आ उपस्थित हुआ। सुथरे को देख उस दिन वाला रागी सतगुरू की हज़ूरी में आ कर कहने लगा, ‘शहनशाह जी ! सुथरा आ गया है।’

सतगुरू ने फरमाया, भाई सुथरे ! तेरी यह शिकायत कर रहे हैं कि तूने इनको गालियां निकाली थी। ‘नहीं सच्चे पातशाह ! मैं गालियां क्यों निकालूंगा इन्होंने क्या बिगड़ा है, जो मैं इनको गालियां निकालूंगा। मैं तो हजूर तीन महीनों बाद आपकी हज़ूरी में उपस्थित हुआ हूँ।’ सुथरे ने बहुत विनम्रता के साथ कहा।

हाँ, हाँ, तीन महीने ही हुए हैं, जब यह गालियां निकाल कर गया था। रागी ने हाथ जोड़ कर विनती की।

मेरे शहनशाह जीओ ! मुझे तो कोई ऐसी बात याद नहीं जिससे झगड़ा हो गया हो और गालियां निकालीं हो। इनसे पूछा जाये कि बात क्या थी कि मैं गालियां निकालने लगा। सुथरे ने अर्ज की।

वह रागी बोला, ‘महाराज ! बात तो कुछ भी नहीं हुई थी और ना ही कोई झगड़ा हुआ था। हम कीर्तन कर रहे थे और शब्द की व्याख्या कर रहे थे, तो यह संगत में आ कर हमें और सुनने वालों को फटकार डाल कर चला गया।

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सुथरा बोला, पातशाह जीओ ! इनसे पूछा जाये कि वह कौन सा शब्द था, जिसकी यह व्याख्या कर रहे थे और मैंने गालियां निकाली।

‘महाराज ! तीन महीने से ज्यादा हो गये हैं, इतना समय हो गया कहाँ याद रहता है कि वह कौनसा शब्द था, जिसकी व्याख्या कर रहे थे। उस रागी ने हाथ जोड़ कर विनती की।

महाराज ! हम संगत में नाम वाणी का लाभ प्राप्त करने आते हैं, परन्तु यह रागी साहब कह रहे हैं कि इनको वह शब्द याद ही नहीं, जिसकी यह व्याख्या कर रहे थे। तो फिर उसकी तुलना में तो मेरी वह गालियों ही अच्छी रही जो इनको आज तक याद है, वह शब्द और यह भूल गए हैं, सुथरे ने कहा।

शहनशाह मीरी-पीरी के मालिक सुथरे की यह दलील सुन कर हँस पड़े और कहने लगे, सुथरे ! तूने जो कहा वह ठीक है। गुरसिक्खों को गुरबानी की तरफ ध्यान देना चाहिए। अगर मन वाणी के साथ एक सुर हो, दूसरा चाहे कुछ कहता रहे, उसे उसकी कही बात का पता ही नहीं चलता, परन्तु जिनका मन बाहर वाली बातों की तरफ उड़ता रहता है वह चाहे जितने मर्जी पाठ या कीर्तन करें, उनका मन लीन नहीं हो सकता। पंचम पातशाह जी ने सुखमनी साहब में मनमुख का यह लक्षण बताया है :

रहत अवर कछु अवर कमावत ॥
मन नही प्रीति मुखहु गंढ लावत ॥

सतगुरू के मुखारविंद से यह महावाक्य सुन कर रागी बड़ा शर्मिंदा हुआ और क्षमा माँग कर खिसकता हुआ।

शिक्षा – गुरसिक्खों को गुरबानी की तरफ ध्यान करना चाहिए। परन्तु जिनका मन बाहर वाली बातों की तरफ उड़ता रहता है वह चाहे जितने मर्जी पाठ या कीर्तन करें, उनका मन लीन नहीं हो सकता।

Waheguru Ji Ka Khalsa Waheguru Ji Ki Fateh
– Bhull Chuk Baksh Deni Ji –

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