Saakhi – Guru Gobind Singh Ji Ka JawabSaakhi - Guru Gobind Singh Ji Ka Jawab

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गुरु गोबिन्द सिंह जी का जवाब

श्री आनंदपुर की पवित्र धरती पर आठ-दस गुरसिक्ख बैठे आपसी विचार-विमर्श कर रहे थे। बातचीत खत्म होते ही एक गुरसिक्ख ने सवाल रख दिया कि संसार में लंबे समय तक व्यक्ति का नाम कैसे रह सकता है? गुरसिक्ख का यह प्रश्न सुन कर एक सूझवान गुरसिक्ख ने उत्तर दिया कि व्यक्ति का नाम उसके घर संतान द्वारा कायम रहता है। पुत्र के कारण पिता का नाम लोग जानते हैं।

दूसरे गुरसिक्ख ने उत्तर दिया, ठीक है दो-तीन पीढ़ीयों तक तो व्यक्ति का नाम जाना जा सकता है और वह भी परिवार के सदस्य ही जानेंगे, उसके बाद सिलसिला खत्म हो जायेगा। दूसरा अगर पुत्र बुरे लक्षणों वाला पैदा हो गया, नाम रहने की बजाए वह अपने पिता के नाम को मिट्टी में मिला देगा। पुत्र के बुरे कर्मों की वजह से व्यक्ति को याद करने की बजाए लोग पुत्र के बाप के नाम से नफरत करेंगे।

फिर दूसरे गुरसिक्ख ने उत्तर दिया कि पुत्र के साथ परिवार में तो थोड़ा बहुत कुछ देर नाम रहेगा परन्तु संसार उसके नाम को नहीं जानेगा। मेरे विचार अनुसार अगर व्यक्ति के पास धन हो उस धन से वह सराय (धर्मशाला/मुसाफिरखाना) बनवा कर साथ में कुआँ लगवा दे, सराय और कुंए पर उस व्यक्ति का नाम लिख दिया जाये कि इस सराय और कुंए की सेवा किस व्यक्ति ने करवाई है। तो प्रत्येक आने जाने वाला मुसाफिर जब सराय में ठहरेगा और कुंए का पानी पियेगा तो वह कुआँ लगवाने और सराय बनवाने वाले को याद भी करेगा और उसके नाम की शोभा संसार में भी करेगा।

तीसरे गुरसिक्ख ने दलील दी कि जिस मानव के पास जमीन हो। वह दस पंद्रह एकड़ में आम का बाग लगवा दे। वृक्षों की उम्र लम्बी होती है और वह बाग धर्मार्थ दान कर दे। आने जाने वाले वाले मुसाफिर जब उस बाग के फल जब खाऐंगे और इन वृक्षों की छायाँ में बैठेंगे तो बाग लगवाने वाले का यश भी करेंगे और उसे हमेशा याद भी करेंगे परन्तु संसार में नाम सदा के लिए कैसे स्थिर रह सकता है?, इस पर सभी की एक राय नहीं बनी।

सभी ने विचार किया कि हम सब ने तो अपनी-अपनी बुद्धि अनुसार राय दी है परन्तु हमारी सभी की सहमति नहीं हुई, क्यों न हम सतगुरु कलगीधर जी से ही पूछें कि व्यक्ति का नाम संसार में सदा के लिए कैसे और कौन सा कर्म करने से स्थिर रहता है?

सभी गुरसिक्ख शाम को सतगुरु जी के सम्मुख दीवान में हाजिर हुए और एक बुजुर्ग सिक्ख ने सतगुरु जी के सम्मुख गले में पल्ला डालकर विनम्रता से विनती की, पातशाह ! आज सुबह हम सात-आठ गुरसिक्ख बैठे विचार कर रहे थे कि व्यक्ति का नाम संसार में सदा के लिए कैसे और किस कार्य को करने से रहता है? किसी ने पुत्र की वजह से, किसी ने यात्री सराय बनाने, किसी ने कुआँ लगवाने और किसी ने पुण्य अर्थ आम का बाग लगवाने से दुनिया में नाम रहने की बात कही है परन्तु सभी की सहमति किसी एक नुक्ते पर नहीं हो पाई। आप जी कृपा करके बताएं कि व्यक्ति का नाम संसार में सदा के लिए किस तरह रह सकता है।

सतगुरु जी गुरसिक्ख की विनती सुन कर मुस्कराए और सम्मुख बैठी संगत को संबोधन करके पूछने लगे, गुरसिक्खो! आप भक्त कबीर जी, भक्त नामदेव जी को जानते हो? सभी ने हाँ में सिर हिलाया कि पातशाह ! हम सभी बाबा कबीर जी और भक्त नामदेव जी को जानते हैं उन की वाणी पढ़ते और सुनते हैं।

सतगुरू जी कहने लगे, जिस समय भक्त कबीर जी, भक्त नामदेव जी हुए हैं उस समय किसी बादशाह का राज था? किसी ने अकबर, किसी ने हंमायू, किसी ने बिनेपाल कह दिया। सतगुरु जी ने दूसरी बार पूछा कि भक्त कबीर जी, नामदेव जी के समय जिन्होंने धर्मशालाएं बनवाईं, कुएँ लगवाये पुण्यार्थ बाग लगवाए क्या किसी को उनका नाम भी याद है? सभी ने ना कर दी और कहा पातशाह ! हजारों दानी आए, हजारों चले गए, कौन इनको याद रख सकता है?

सतगुरु जी ने सिक्खों को संबोधित करते हुए कहा, आप स्वयं ही बताओ बाबा कबीर जी, बाबा नामदेव जी के समकालीन राजाओं के नाम का किसी को पता नहीं, और न ही उस समय के दानी, साहूकारों का नाम कोई जानता है परन्तु भक्त कबीर जी, भक्त नामदेव जी, धु्रव जी, प्रहलाद जी और अन्य भक्तों के नाम आप सभी जानते हो। इन्होंने न बाग लगवाए न धर्मशालाएं बनवाईं न इन्होंने कुएँ लवाए और न ही इनके पास कोई सत्ता या धन ही था परन्तु सारा संसार इनको क्यों जानता है? क्योंकि इन्होंने परमात्मा का नाम जपा है। जब तक नामी है तब तक नाम जपने वालों का नाम कायम रहेगा। सतगुरु तेग बहादुर साहब जी का गुरबानी में फरमान है –

नामु रहिओ साधू रहिओ रहिओ गुरु गोबिंदु ।।

हे प्राणी जनो ! संसार में सदा के लिए, परमात्मा, परमात्मका का नाम, सतगुरु और परमात्मा का नाम जपने वाले साधु जन सदा के लिए कायम रहते हैं परन्तु परमात्मा का नाम कोई विरला ही जपता है। सतगुरु जी ने दूसरी पंक्ति में फरमाया है –

कहु नानक इह जगत मै किन जपिओ गुर मंतु ।।५६।। (अंग १४२९)

सतिगुरू कलगीधर जी ने कहा भाई सिक्खो ! देखो नामदवे जी दिन रात ‘गोबिंद गोबिंद’ करते थे, गोबिंद गोबिंद करने की बरकत से नामदेव का मन परमात्मा में लीन हो गया। लोग जिस नामदेव को आधी कौड़ी का समझते थे, नाम जप कर वह लखपति बन गया। इसी प्रकार भक्त कबीर जी ने बुनने और करघा तनने की तरफ से ध्यान संकोच कर परमात्मा के नाम के साथ प्रीत जोड़ी। जिस कबीर को लोग नीच कह कर दुत्कारते थे, परमात्मा के नाम की बरकत से वह गुणों का समुद्र बन कर संसार प्रसिद्ध हुए हैं। रविदास जी जो दिन रात मरे हुए पशुओं को ढोकर बाहर फैंकने और चमड़ा उतारने का काम करते थे, उन्होंने माया का प्यार त्याग कर परमात्मा के नाम के साथ प्रीत बनाई। नाम की प्रीत की वजह से उनको परमात्मा के दर्शन हो गए और वह जगत प्रसिद्ध हो गए। सैन नाई जो लोगों की बुत्तिया निकालता था नाम जपने की वजह से परमात्मा उसके हृदय में बस गया और वह जगत प्रसिद्ध हो भक्तों की श्रेणी में शुमार हो गया। इन भक्तों की गाथाएं और प्रसिद्धि सुन कर धन्ना जाट भी परमात्मा की भक्ति करने लग गया। भक्ति करने की बरकत से धन्ने को परमात्मा के साक्षात दर्शन हुए और धन्ना जाट बड़े भाग्य वाला हो गया। यह सारी बरकत केवल नाम की थी और है। धन गुरू अर्जुन देव साहब जी का फरमान है –

गोबिंद गोबिंद गोबिंद संगि नामदेउ मनु लीणा ॥
आढ दाम को छीपरो होइओ लाखीणा ॥1॥ रहाउ ॥
बुनना तनना तिआगि कै प्रीति चरन कबीरा ॥
नीच कुला जोलाहरा भइओ गुनीय गहीरा ॥1॥
रविदासु ढुवंता ढोर नीति तिनि तिआगी माइआ ॥
परगटु होआ साधसंगि हरि दरसनु पाइआ ॥2॥
सैनु नाई बुतकारीआ ओहु घरि घरि सुनिआ ॥
हिरदे वसिआ पारब्रहमु भगता महि गनिआ ॥3॥
इह बिधि सुनि कै जाटरो उठि भगती लागा ॥
मिले प्रतखि गुसाईआ धंना वडभागा ॥4॥2॥ (अंग ४८८)

इसलिए गुरसिक्खो ! संसार में नाम, न किसी अमीर का, न मंत्री का, न राजपाट वाले का, न मायाधारी का, न ही ऊँचे मुरातबे वाले का सदा रहता है। नाम हमेशा परमात्मा का नाम जपने वालों का ही रहता है। अगर आपके मन में भी अपने नाम को प्रसिद्ध करने की लालसा है तो स्वयं के नाम को प्रसिद्ध करने का यत्न न करो। बल्कि परमात्मा के नाम के साथ जुड़ो जो प्रसिद्ध था, प्रसिद्ध है और सदा प्रसिद्ध रहेगा। जो ऐसे नाम के साथ जुड़ेगा वह भी सदा के लिए स्थिर हो जायेगा।

शिक्षा – गुरदेव जी माँझ की वार में फरमाते हैं कि व्यक्ति संसार में आता है, अपना नाम कमाने की कोशिश करता हुआ इस संसार से चल जाता है। थोड़े समय के बाद उस का नाम भी खत्म हो जाता है- आइआ गइआ मुइआ नाउ ॥ (अंग १३८) सतगुरू जी के घर महानता है ही नाम की, नानक कै घरि केवल नामु ॥ (अंग ११३६) इसलिए हमें इस शाश्वत स्थिर रहने वाले नाम की कमाई कर अपने जीवन को सफल करने के लिए नाम की अमूल्य रहमत गुरू बख्शी मर्यादा अनुसार पाँच प्यारों से खंडे की पाहुल द्वारा प्राप्त कर कर उस नाम के साथ जुडऩे के लिए प्रयास करना चाहिए। प्रयास करेंगे तो सतगुरु जी अवश्य सफलता प्रदान करेंगे।

Waheguru Ji Ka Khalsa Waheguru Ji Ki Fateh
– Bhull Chukk Baksh Deni Ji –

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