Sikh History – History of Sri Amritsar Sahib

Sikh History - History of Sri Amritsar Sahib

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जानें कैसे बसा था श्री अमृतसर, किसने रखी थी नींव

जून 1570 ईस्वी में, गुरू अमर दास जी ने रामदास जी को अपने साथ लिया और गुमटाला, तुंग, सुल्तानविंड और गिल्लवाली गाँवों के मुखियों और चौधरियों को इकठ्ठा करके उनको एक नया नगर बसाने की अपनी योजना बताई। सभी ने गुरू जी की हाँ में हाँ मिला दी। जितनी-जितनी जमीन गुरू जी ने नगर बसाने के लिए उनसे माँगी, उन सभी ने बिना किसी ना-नुकर दे दी। गुरू जी ने उनको जमीन के हिसाब पैसे अदा कर जमीन का पट्टा अपने नाम लिखवा लिया और नये नगर का नाम गुरू का चक्क रख कर निर्माण कार्य का नींव-पत्थर रख दिया।

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गुरू का चक्क का नींव-पत्थर उस जगह रखा गया, जहाँ गुरू नानक देव जी ने 1497 ईस्वी में अपने पवित्र चरण डाले थे, जब वह भाई मर्दाने को साथ ले कर भूली हुई दुनियां को सच्चा मार्ग दिखाने के लिए सुल्तानपुर से अपनी पहली फेरी पर निकले थे। इस जगह बैठे हुए गुरू नानक देव जी ने कहा था, भाई मरदाना, किसी समय इस जगह तीर्थ प्रकट होगा और धर्म का प्रचार-केंद्र बनेगा। गुरू नानक देव जी के वचन सच्चे होने लगे। गुरू अमर दास जी ने श्री रामदास जी को अच्छी तरह समझाने के बाद कि किस तरह का नगर बसाने की उनकी ईच्छा थी, वह स्वयं वापस गोइन्दवाल लौट गए और नगर के निर्माण की जिम्मेदारी श्री रामदास जी को सौंप गए। उन्होंने गुरू के हुक्म अनुसार निवास स्थान बनवाया, जो गुरू का कोठा नाम से प्रसिद्ध हो गया। उसके बाद उन्होंने संतोखसर सरोवर के लिए खुदाई शुरू करवा दी। सिक्ख सेवकों और दिहाड़ीदारों ने काम लंबे समय का देख कर अपने रहने के लिए वहां पर ही घर बनाना आरंभ कर दिए। श्री रामदास जी ने सेवकों और अन्य कामगारों के लिए लंगर का प्रबंध कर दिया, जहाँ हर जरूरतमंद पेट भर कर खाना खा सकता था।

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एक बार श्री रामदास जी, गुरू का चक्क से गोइन्दवाल में गुरू जी के दर्शनों के लिए गए हुए थे। उनसे गुरू जी नये नगर के निर्माण का काम बड़े जोरों पर चलता सुन कर बड़े खुश हुए। गुरू जी ने श्री रामदास जी को गुरगद्दी के योग्य देख कर 1 सितम्बर 1574 ईस्वी को यह जिम्मेदारी सौंप दी और अपने परिवार सहित नये बस रहे नगर चले जाने की आज्ञा कर दी। गुरू रामदास जी के गुरू का चक्क में निवास करने के साथ गुरू के दर्शन करने के लिए संगत यहाँ पहुँचने लग गई। उसके बाद इस नगर का नाम चक्क रामदास हो गया और हर पेशे के लोग यहाँ आ कर बसने लगे। 1577 ईस्वी में गुरू जी ने तुंग गाँव वालों से पाँच सौ बीघे जमीन और खरीद ली जिससे नगर के बढऩे में कोई मुश्किल न हो। अमृतसर सरोवर के बन जाने के बाद नगर का नाम अमृतसर प्रसिद्ध हो गया।

Waheguru Ji Ka Khalsa Waheguru Ji Ki Fateh
– Bhull Chuk Baksh Deni Ji –

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